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गुरुवार, 28 जनवरी 2021
दिव्य रस में सराबोर होना है
तय शुदा समय है हर वस्तु का, उसके बाद उसका उपयोग अनुपयोगी हो जाता है। हमें जो आनन्द इस संसार में प्राप्त है हम सोचते हैं ऐसा कुछ अब आगे नहीं मिलेगा। हमारी महसुसियत ही हमें बहला रही है...
मंगलवार, 26 जनवरी 2021
आकाश से साधना का मिलन
मस्तिष्क की ऊंचाइयों और दिल की गहराइयों में बड़ा फर्क है। एक आकाश के जितना ऊँचा और एक साधना के धरातल से गहरा है, आकाश की अपनी ऊंचाइयां हैं वह ऊर्जा का रूप है वह स्वयं सिद्ध है पर साधनायें जब अपना रूप दिखाती हैं तो वह मस्तिष्क की ऊंचाइयों से भी परे आकाश को नीचे छोड़ ऊपर की ओर उर्ध्वगामी हो जाती हैं। वह सातों आकाशों को छोड़ परम्-पुरुष से जा लगती है। आकाश को साधना के स्तर को समझना चाहिए और साधना को चाहिए की वह आकाश का सम्मान करे। आकाश में जो दोनों ज्योति पुंज हैं चन्द्र और सूर्य वह धरती की साधना की कामना भी है और उसके कल्याण के साधन भी। साधना का साधन आकाश है, न साधना को अंहकार हो न ही आकाश को ग्लानि हो। दोनों का मिलन ही परम् सत्य है......
~पवन राज सिंह
सोमवार, 25 जनवरी 2021
कोई तो इसका जवाब दे
मन के पेड़ पर जो पंछी कलरव कर रहे हैं इनको कोई ऐसा दाना डाला जाये जिससे की बार बार दिमाग की नसों में होने वाला स्पंदन सर्वदा के लिए समाप्त हो जाये। क्या उपाय इस ख्वाहिशों के बागीचे में उगे इन मुरझाये पौधों का जिनको सींचते सींचते मनु की मनुष्यता घिसती चली जा रही है। इस भवसागर के अंदर कोई किनारा तो नज़र आना चाहिए बार बार हर बार नहीं हारने वाली दौड़ जिसमें सभी भाग लेते हैं सभी हार जाते हैं सभी को यह गुमान भी रहता है की हम ही जीतेंगे। इन सब सवालों के लिए कोई ऐसा उपाय खोजा जाये जो इन पर पूर्ण विराम लगा दे। उपाय वह कुंजी है जो जन्मों के इस फेर को मिटा देगी......?????~पवन राज सिंह
रविवार, 24 जनवरी 2021
कितने नासमझ हैं हम
हमारी समझ ऐसी है जैसे मन्दिर में बजने वाली टनटन को बच्चा कुल्फ़ी वाले की टनटन समझ लेता है, हमको इशारा कुछ और मिलता है और हम उसे समझते कुछ हैं हाँ माना इसमें परमेश्वर की माया हमें भ्रमित करती है पर यह जगत कल परसों तो नहीं बना मनुष्य को ये सब अनुभव भी है और जानकारी भी पर फिर भी मासूम सा समझदार मनुष्य बार बार हर बार सामने हो रहे इशारों को नहीं समझता। इशारा करने वाला कोई व्यसन से हमें मुक्ति दिलाने के लिए कुछ कहानी कह सकता है, कोई वैद्य गम्भीर रोग से मुक्ति दिलाने के लिए कड़वी दवा दे रहा है। यह हम टाल देंगे तो टाल दिए जाएंगे। अपने आस-पास दैनिक जीवन में हो रहे इशारों को देखिये सृष्टि हमें इशारों में कुछ कह रही है.....कितने नासमझ हैं हम
~पवन राज सिंह
गुरुवार, 21 जनवरी 2021
पुनः विचार करें
जो जीवन की विधा तुमने सीखी थी उस शैली से अन्य कई शैलियाँ हैं, अपने ही ज्ञान को सब कुछ मान लेना ही श्रेष्ठता नहीं है। स्वयं की कल्पना ही श्रेष्ठतम नहीं है उसमें आगे आकर कोई अड़चन आ सकती है।श्रष्टि के प्रारम्भ में हर उस लावा के पिंड का यह संसार है जो ज्वालामुखी के मुख से निकल रहा है। किसी की सरलता किसी का अपनापन किसी का प्रेम ये सब मनुष्य के अलग रूप हैं जो उन्हें भगवान से मिले हैं। तुम्हारा तेज मस्तिष्क तुम्हें अहंकार के नजदीक ले जा सकता है इसलिए उस पाप से बचने के लिए इस गुण से लिप्त न रहें। क्योंकि संसार चलाने वाले की नजर में जो नजारा है उसकी हम कल्पना भी नहीं कर सकते। तो पुनः विचार करें कहाँ ये त्रुटि हम कर रहे हैं तो प्रयास करें ये हमसे आगे न हो.....
.~पवन राज सिंह
बुधवार, 20 जनवरी 2021
अभ्यास कीजिए समझिए नहीं.....
मनुष्य जन्म से ही किसी न किसी क्रिया को कर रहा है। कोई जीव यह माने की केवल हाथ पैर का चलना ही क्रिया है नहीं यहां तक की देखना, सुनना, मनन करना बोलना आदि सभी क्रियाएँ हैं। दो क्रियाओं के मिलन को योग(जमा) तो कहते ही हैं पर इसमें आध्यात्मिक रूप में भी मिलन होता है जिसे आत्मा का ज्ञान से योग होता है। ज्ञान अनुभव का नाम है जो मन बुद्धि अहंकार को अनुभव होता है पर योगिक क्रिया में कोई व्यक्ति उसे समझने का प्रयास करता है तो विफल हो जाता है। उसके किन्तु परन्तु उसे रोकते टोकते हैं। यह (योग) निरन्तर प्रयास की एक कड़ी है जो व्यक्ति कड़ी से कड़ी मिलाता जाएगा वह एक दिन कोई चेन बना ही लेगा। अभ्यास करिए अनुभव कीजिए समझिए नहीं बस करते रहिए बनत बनत बनजाई.....~पवन राज सिंह
मंगलवार, 19 जनवरी 2021
शरणागति ही श्रेष्ठ है
हम जो कह रहे हैं वह परम् शरणागति की ओर तुम्हें ले जाएगी। यही मार्ग मुक्ति का है बाकी सभी मार्गों में आप जाने क्या क्या प्राप्त कर लेंगे किन्तु यह complete surrender ही मनुष्य को गन्तव्य तक पहुंचाएगा। अब यहां जो दिक्कत है वह यह की कुछ लोगों की तो भौतिकता से आँख ही नहीं खुलती और कुछ ने स्वयं को ही बुद्धिमान जानकर तर्क करने की अड़चन पैदा कर रक्खी है। यह तर्क शक्ति अपने साथ में कुछ कुत्तों को पाले रखती है हर किसी पर यह अपने कुत्ते छोड़ देती क्या,क्यों,कैसे और कहाँ जो उनके असंख्य सवालों का जवाब दे उसके बाद तर्क को भरोसा आएगा पर उसके भरोसे का क्या भरोसा। वह तो खुद भटका है वह कैसे जान पाएगा। जो लकीर खेंची है उसी पर चलने का प्रयास करें चलती रेल में उतरने से गन्तव्य प्राप्त नहीं होगा हर कहीं न उतरें अपने अंदर डूबे रहें क्या पता आप स्वयं ही इस भवसागर को पि जाएँ......~पवन राज सिंह
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