मनुष्य जन्म से ही किसी न किसी क्रिया को कर रहा है। कोई जीव यह माने की केवल हाथ पैर का चलना ही क्रिया है नहीं यहां तक की देखना, सुनना, मनन करना बोलना आदि सभी क्रियाएँ हैं। दो क्रियाओं के मिलन को योग(जमा) तो कहते ही हैं पर इसमें आध्यात्मिक रूप में भी मिलन होता है जिसे आत्मा का ज्ञान से योग होता है। ज्ञान अनुभव का नाम है जो मन बुद्धि अहंकार को अनुभव होता है पर योगिक क्रिया में कोई व्यक्ति उसे समझने का प्रयास करता है तो विफल हो जाता है। उसके किन्तु परन्तु उसे रोकते टोकते हैं। यह (योग) निरन्तर प्रयास की एक कड़ी है जो व्यक्ति कड़ी से कड़ी मिलाता जाएगा वह एक दिन कोई चेन बना ही लेगा। अभ्यास करिए अनुभव कीजिए समझिए नहीं बस करते रहिए बनत बनत बनजाई.....~पवन राज सिंह
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