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गुरुवार, 28 जनवरी 2021

दिव्य रस में सराबोर होना है

 तय शुदा समय है हर वस्तु का, उसके बाद उसका उपयोग अनुपयोगी हो जाता है। हमें जो आनन्द इस संसार में प्राप्त है हम सोचते हैं ऐसा कुछ अब आगे नहीं मिलेगा। हमारी महसुसियत ही हमें बहला रही है...
हम कड़ाही के पात्र में उन तीन चार जलेबियों की तरह हैं जो हलवाई की झर में आने से हर बार छूट जाती हैं। हमें यह ज्ञान नहीं है की इस जीवन के अंत के बाद एक सुगम सफर का आरम्भ है। अगले पात्र में हमें मीठे रस में सराबोर कर दिया जाएगा पर हमें इस भवसागर की आंच में जल रहे इच्छाओं के तेल में पकने की आदत सी हो गई है। अगले पात्र में जब रस में सराबोर हम हों जाएंगे तो हमें  उसमें तो आनन्द मिलेगा ही पर उसको जो चखने वाला मालिक है वह अनुभूति परमानन्द की होगी...~पवन राज सिंह

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