हम जो कह रहे हैं वह परम् शरणागति की ओर तुम्हें ले जाएगी। यही मार्ग मुक्ति का है बाकी सभी मार्गों में आप जाने क्या क्या प्राप्त कर लेंगे किन्तु यह complete surrender ही मनुष्य को गन्तव्य तक पहुंचाएगा। अब यहां जो दिक्कत है वह यह की कुछ लोगों की तो भौतिकता से आँख ही नहीं खुलती और कुछ ने स्वयं को ही बुद्धिमान जानकर तर्क करने की अड़चन पैदा कर रक्खी है। यह तर्क शक्ति अपने साथ में कुछ कुत्तों को पाले रखती है हर किसी पर यह अपने कुत्ते छोड़ देती क्या,क्यों,कैसे और कहाँ जो उनके असंख्य सवालों का जवाब दे उसके बाद तर्क को भरोसा आएगा पर उसके भरोसे का क्या भरोसा। वह तो खुद भटका है वह कैसे जान पाएगा। जो लकीर खेंची है उसी पर चलने का प्रयास करें चलती रेल में उतरने से गन्तव्य प्राप्त नहीं होगा हर कहीं न उतरें अपने अंदर डूबे रहें क्या पता आप स्वयं ही इस भवसागर को पि जाएँ......~पवन राज सिंह
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