वाइज़ तुझे फिकर है क्यों सारे जहान की
रिंदों को मिल गयी है दवा हर परेशान की
बेफिक्र हुए जाता है मयखाने से हर कोई
साक़ी के ज़ाम में है सिफ़त आसमान की
मुहब्बत से मिल रहे हैं रकीबों से भी गले
तारीफ़ क्या करूँ...साक़ी तेरी दूकान की
महफ़िल में तेरी झूमके फिर लोट आते हैं
झुमके अपनी धुन में लोटके, आ जाते हैं
बातें मीठी लगती हैं बहुत तेरी जबान की
वादे का तेरे एतबार उनको है, इस कदर
आ गये हैं वो इज्जत गंवा के खानदान की
खोजती हैं यार के दर को रिंदों की टोलियां
खुशबु आती है जहाँ से ज़न्नत के ज़ाम की
बात ये राज़ की है तू किसी से न कहना...
खबर न हो जाये सब को यार के मकान की
~पवन राज सिंह
