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शनिवार, 9 जनवरी 2021

परमेश्वर की रचना का निरादर न करें

 संसार की रचना करने वाले ने कुछ गलत तो नहीं रच दिया, कहीं कोई त्रुटि तो उससे नहीं हो गई। यह अक्सर सोचना पड़ता है मुझे, मैं यह क्यों सोचता हूँ क्या मेरा यह विचार गलत है। आप को यह लगेगा की यह क्या विचार आया। हाँ, यह विचार आया किन्तु इसके पीछे कारण है; जब भी कोई व्यक्ति यह सोचता है की मेरे साथ संसार में गलत हो रहा है, मैं सबसे दुखी, दुर्भाग्यवान या अभागा हूँ मेरा जीवन ही गलत है तो यह विचार उस रचनाकार की कृति को दोष देता है। क्योंकि जिसने तुम्हें रचा है वह सार्थक रचियता है उसका फेंका हर बीज अद्भुत है सकारात्मक है। क्यों कोई अपने आपको हीन और तुच्छ समझे,ऐसा विचार परमेश्वर को दोष देने के पाप जैसा है।

~पवन राज सिंह

जीवन का खेल


जिसने इस जीवन के प्रांगण में तुम्हें खेल खेलने के लिए यहां भेजा.....खेल तो यह नहीं था जो तुम खेल रहे हो अलमारी खोलना बन्द करना तो नहीं सिखाया था तुम्हें, तुम्हें तो खोलने थे वो खिड़कियों के पल्लै जो पूर्व जन्म में तुमने ढलती उम्र के साथ बन्द कर दिए थे। पूर्व जन्मों से सञ्चित जो प्रकाश तुम्हारे हिस्से का था न तो तुम उसे प्राप्त कर पा रहे हो और न ही उसकी नई खेप इस जन्म में कमाने की कोशिश कर रहे हो। भौतिकता का लेप लगाकर सारे बदन पर अपनी रँगीन तबियत का रँगीन नजारा करने वालों देखो, जब तुम पहले मनुज के काल में जन्मे थे तब तुम क्या थे और आज क्या बन गए हो। स्वतः ही तुम्हारे मस्तिष्क की ट्यूब लाइट बन्द होकर तुम्हारी आत्मा का सूर्य जगमगा उठेगा तुम्हें जाग्रुत करेगा, अपने नचिकेता को जगाओ शायद तुम्हें अपने पूर्व जन्म का कोई फल मिल जाये, जन्मों से चले आ रहे चक्र को तुम विराम दे सको.....

तो इन्तजार किस बात का किसी पीपल के पेड़ के नीचे बैठो कुछ देर....

~पवन राज सिंह

ध्यान से दुरी या नजदीकी


 ध्यान से दुरी या नजदीकी:

क्या ध्यान के विमान पर बैठकर हम उड़ सकते हैं, अपनी असफलताओं को अपनी दुविधाओं को दूर कर सकते हैं। ध्यान क्या कोई राज-मार्ग है जो सामान्य सड़क से अलग है, जहाँ इस तरह की यातायात की उथल पुथल नहीं है। क्या इन वाहनों का कोलाहल नहीं है वहाँ, यही वे प्रश्न हैं जो चिर काल से सामान्य व्यक्ति अपने ध्यान से दुरी और नजदीकी के अंतर को खोजता रहता है। आइये कुछ ध्यान पर ध्यान दें
किसी भी योगिक सम्प्रदाय की विधियाँ या प्रक्रिया जिनसे सामान्य व्यक्ति एक सिद्ध पुरुष और फिर दिव्य पुरुष बनता है। यह एक सहज और सरल और नियमित प्रयास है जो बनते बनते बन जाता है। किसी से किसी ने कहा राम का नाम लो श्वास के साथ एक श्वास भी खाली न जाये, अभ्यासी ने कहा मुझसे तो राम कहा न जाएगा तो अनुभवी ने उससे कहा मरा तो कह सकते हो। अभ्यासी बड़ा प्रसन्न हुआ वह एक लुटेरा था राह चलतों को लूटना मारना उसका काम था उसके लिए मरा कहना सहज था। उसने उस अनुभवी की बात को बहुत सहजता से स्वीकारा वह एक सिद्ध पुरुष हुआ फिर दिव्यता प्राप्त हुई। आप जिस जाती धर्म संस्कार से जुड़े हैं आस पास जो भी सीख रहे हैं। उसे शने शने करते रहें श्वास के साथ जो भी आता जाता नाम है वह ही तुम्हें योगी बना देगा सारा सिद्धांत श्वासों के मध्य है। आँख बन्द करके करेंगे तो ध्यान होगा और गहरे में उतरेंगे तो समाधि पर इन सबसे पहले इनके बारे में सोचना बंद करना होगा बैठना होगा। मन (mood) के इंजन को बन्द नहीं कर सकते तो उसके गियर बॉक्स को न्यूट्रल करना होगा। जो कुछ सहजता से हो जाए वह करते रहिए। यहां हम आपको यह तक कह रहे हैं जो भी आप करेंगे जो भी आप सीख चुके हैं उसी में एकाग्र रहें। हम अपनी और से कुछ आप पर थोपना नहीं चाहते। बस प्रयासरत रहें

~पवन राज सिंह

दोषारोपण से बचें

 दोषारोपण से बचें

दूसरे को दोष देकर पाप लेने वाले बहुत हैं, भरे पड़े हैं अटे पड़े हैं। जरा सी नजर घुमी किसी ने पीठ फेरी और उसकी बुराई शुरू दोषारोपण लगाने में लोग तो Phd० करके बैठे हैं। महारत हासिल है उनकी कोई बात सुन ले तो तीन चार दिन आदमी उनका कायल हो जाता है। ऐसे व्यक्तियों का साथ अच्छा नहीं है, आज ही त्यागिये। अच्छाई देखिये लोगों में उनकी व्यथा सुनिए उनका वास्तविक हाल समझिए,एक दिन उनकी जूती में पैर रख के देखिए। आपको स्वतः आभास होगा और आप दोषारोपण के पाप से बचेंगे इससे आपके किए पूण्य समाप्त  नहीं होंगे इसमें श्रम नहीं करना बस थोडा कन्ट्रोल करना है।  आगे आपकी मर्जी या खुदगर्जी..

~पवन राज सिंह

शनिवार, 11 जुलाई 2020

रूठ के जाना तेरा ~दाग देहलवी

ले चला जान मेरी रूठ के जाना तेरा
ऐसे आने से तो बेहतर था न आना तेरा

अपने दिल को भी बताऊँ न ठिकाना तेरा
सबने जाना जो पता एक ने जाना तेरा

तू जो ऐ ज़ुल्फ़ परीशान करती है
किसके उजड़े हुए दिल में ठिकाना तेरा

आरज़ू ही न रही सुब्हे-वतन की मुझको
शामे-गुरबत है अजब वक्त सुहाना तेरा

ये समझ कर तुझे ऐ मौत लगा रखा है
काम आता है बुरे वक्त में आना तेरा

क़ाबा-ओ-दैर में या चश्मे-ओ-दिले-आशिक में
इन्हीं दो-चार घरों में है, ठिकाना तेरा

दाग को यूँ वो मिटाते है और फरमाते हैं
तू बदल डाल हुआ नाम पुराना तेरा

~दाग देहलवी

गुरुवार, 9 जुलाई 2020

बंदे ख़ुदा को प्यारे हैं


हज़ार रंजो-मुसीबत के दिन गुजारे हैं
कभी जो लड़ गई किस्मत तो वारे-न्यारे हैं

ख़ुदा की शाने-करीमी को पूछना क्या है
गज़ब तो ये है, गुनहगार हम तुम्हारे हैं

बुरा न जान, हसीनों को मान, ऐ वाइज़
ख़ुदा गवाह, ये बन्दे, ख़ुदा को प्यारे हैं

तुम्हारी *चश्मे-फसूंसाज़ से नहीं शिकवा
हमें है खूब खबर जिनके ये इशारे हैं

वफ़ा करो कि जफ़ा एख्तियार है तुमको
बुरे हैं या भले हैं जैसे हैं तुम्हारे हैं

खुलेन बाबे-इबादत तो क्या करे कोई
बहुत दुआ ने पुकारा है, हाथ मारे हैैं

बहकती-फिरती हैं आहें, तबाह हैं नाले
रफीक दिल के सहारे से बेसहारे हैं

जमीं पे रश्के-महो-महर हैं हसीं लाखों
फ़लक में दो ही तो चमके हुए सितारे हैं

वो ^तुन्द-खूँ हैं तो हों, 'दाग' कुछ नहीं परवाह
मिजाज बिगड़े हुए सैकड़ों संवारे हैं
~दाग देहलवी
*जादुई आँखें ^बिगड़े स्वभाव वाला

सोमवार, 6 जुलाई 2020

कुछ शेर जो कहावत हो गए

ऐसे बहुत से शायर हैं, जिनके शेर का दूसरा मिसरा (line) इतना मशहूर हुआ, कि लोग पहले मिसरे (line) को तो भूल ही गये।
ऐसे ही, चन्द उदाहरण यहाँ पेश हैं:


"ऐ सनम वस्ल की तदबीरों से क्या होता है??
वही होता है जो मंज़ूर-ए-ख़ुदा होता है।"
- मिर्ज़ा रज़ा बर्क़

 "भाँप ही लेंगे इशारा सर-ए-महफ़िल जो किया,
ताड़ने वाले क़यामत की नज़र रखते हैं।"
- माधव राम जौहर


"चल साथ कि हसरत दिल-ए-मरहूम से निकले,
आशिक़ का जनाज़ा है, ज़रा धूम से निकले।"
- मिर्ज़ा मोहम्मद अली फ़िदवी


 "दिल के फफोले जल उठे सीने के दाग़ से,
इस घर को आग लग गई, घर के चराग़ से।"
- महताब राय ताबां


 "शहर में अपने ये लैला ने मुनादी कर दी,
कोई पत्थर से न मारे मेंरे दीवाने को।"
- शैख़ तुराब अली क़लंदर काकोरवी


'मीर' अमदन भी कोई मरता है?
जान है तो जहान है प्यारे।"
- मीर तक़ी मीर

"ईद का दिन है, गले आज तो मिल ले ज़ालिम,
रस्म-ए-दुनिया भी है,मौक़ा भी है, दस्तूर भी है।"
- क़मर बदायूंनी

"क़ैस जंगल में अकेला है मुझे जाने दो,
ख़ूब गुज़रेगी, जो मिल बैठेंगे दीवाने दो।"
- मियाँ दाद ख़ां सय्याह


 "शब को मय ख़ूब पी, सुबह को तौबा कर ली,
रिंद के रिंद रहे हाथ से जन्नत न गई।"
- जलील मानिकपुरी


"ये जब्र भी देखा है तारीख़ की नज़रों ने,
लम्हों ने ख़ता की थी, सदियों ने सज़ा पाई।"
- मुज़फ़्फ़र रज़्मी।"

Courtesy:Whatsapp University
संकलन :पवन राज सिंह

कलाम 19

 दर्द-ए-इश्क़ दिल को दुखाता है बहुत विसाल-ए-यार अब याद आता है बहुत ज़ब्त से काम ले अ' रिंद-ए-खराब अब मयखाने में दौर-ए-ज़ाम आता है बहुत साक़ी...