ज़ुदा ख़ुद से करके अपना हमें बनाया है
जल्वा यार ने दीवानों को दिखलाया है
है निहाँ भी और जल्वा-नुमा भी है वही
दिखाई जो नहीं देता और नज़र आया है
दो घूंट यहीं चख ली जाये तो है बेहतर
शैख साहब ने चुपके से ये फ़रमाया है
हो रहा है शोर उधर और मयखाना इधर
साक़ी तेरे रिंदों ने ठिकाना कहाँ बनाया है
इल्म किताबों में जो नहीं ये वही तो है
सबक शम्स तबरेज़ ने ये सिखलाया है
कदमों में है सर और उठता नहीं दर से
आते आते मेरी निस्बत में ये रँग आया है
राज़-ए-इश्क़ कह दें ग़र दीवाने ये तुमसे
क्यों शमआ पर परवानों का यूँ साया है
~पवन राज सिंह
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