ये सितम तो दीवाने पे कम से कम ढा जाईये
जा तो रहे हैं आप कम से कम मुस्कुरा जाइये
उदू से मिलके गले नयी मुहब्बत में हैं गिरफ्तार
पुराने आशिक़ को कम से कम पहचान जाइये
ढूंड लेंगे ये दीवाने फिर से इक हसीन कातिल
मुहब्बत भरे खतों को कम से कम मिटा जाइये
दर्द-ए-इश्क़ मिटाये तो मिट जाएंगे ये दिल जले
ये परवाने की शमआ' कम से कम जला जाइये
हो रहे हैं हमारे इश्क़ के चरचे गरम बाज़ारों में
इस फैलती आग को कम से कम बुझा जाइये
ये राज' न कहना किसी से ये है राज़-ए-इश्क़
दिल-ए-बेताब को कम से कम समझा जाइये
~पवन राज सिंह
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