सत्य की सुई उठाने का विचार ही माथे पर पसीना ला देता है किन्तु झूँठ के गठ्ठर उठाने में आदमी हिचकता नहीं है। हम यह जानते हुए की पाप कर्म हमें और हमारे धर्म (सञ्चित पूण्य कर्म फल) को हानि पहुंचाएगा फिर भी समय काल परिस्थित वश हम इस पाप कर्म की प्रक्रिया को चालु रखते हैं। कुछ चरित्र ऐसे होते हैं जो कटुता रखते हैं किन्तु बनते मीठे हैं कुछ ऐसे होते हैं जो मौज में रहते हैं उन्हें समझने में भूल होती है, उनको देखते ही हम दूर सरक जाते हैं किन्तु ऐसे लोग काम के होते हैं खरा खरा बोलने वाले ऐसे लोग भले होते हैं। सत्य और झूँठ की भी ऐसी ही कहानी है एक मीठा लगता है बोलने में एक खरी खरी कहता इसलिए उससे हम किनारा करते हैं। झूँठ के तो कई सर होते हैं वो किसी भी जगह से अल्प काल के लिए octopus की तरह आपको बचा सकता है। सत्य निहत्था है उसकी चाल भी पियादे की तरह सीधी है वह झूँठ के घोड़े की तरह टेढ़ी चाल चलना नहीं जानता। सत्य का उपासक सदैव जीवन में दुःख और पीड़ा ही भुगतता है, किन्तु जब न्याय के देवता से साक्षात्कार होगा तो यह सत्य एक सत्य के बदले लाखों झूँठ के फन्दों से लिप्त पापों को काटेगा और वहां यह सत्य संख्या में कम होगा किन्तु इसका प्रतिफल हमें लाखों गुणा अधिक प्राप्त होगा। यहां यह सत्य एक सुखी बासी रोटी के निवाले जैसा प्रतीत हो रहा है किन्तु न्याय के देवता के आगे यह वह राजसी भोजन से भी अनमोल होगा तो फैसला आपको करना होगा, सत्य के साथी बनोगे या झूँठ के व्यापारी .....
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