हर इंसान को अपनी अपनी खुशियों ने सम्भाल रक्खा है, अपनी अपनी मजबूरियों ने परेशान भी कर रक्खा है। केवल आत्म सन्तुष्टि और मन की व्याकुलता जैसे दो चेहरे हैं जो अपनी अपनी और उम्र भर इंसान को खिंचते रहते हैं। किसी इंसान के अंदर रूहानियत घर कर गई है तो उसे बुरे वक्त में एक सब्र का सहारा मिल जाता है जिसे आत्म सन्तुष्टि की राह पर चलने का कोई एक मकाम कहा जा सकता है। आप यदि इसमें आगे की और बढ़ना चाहें तो आगे और मंजिलें आती हैं जो मन की व्याकुलता को समूल नष्ट कर देती है। या यूँ कहें की नफ़सानियत के दांव-पेंचों से इंसान को बाहर ले आती है। बात दुनियावी ख्वाहिशों में घिरने की हो या मन की चंचल गति के अनुसार अपने आपको भगाए रखने की हो दोनों ही में व्यक्ति अपनी रूहानियत अपनी आत्मीयता को निचोड्ता रहता है। कुछ ऐसे के पीछे दोडता रहता है जो कुछ पल का कुछ दिन कुछ महीनों या कुछ सालों का है ये कुछ 10 50 100 1000 भी हो सकता है पर वह हजार वर्ष का भी दुनियावी मजा या राजसी विलास उल्टी गिनती गिनता हुआ अपने मकाम शून्य की और बढ़ता जा रहा है, और उसे इक रोज समाप्त तो होना ही है । अब बात उस अनन्त की की-जाए जो हमसे पहले भी था और आगे भी रहेगा, जी हाँ शून्य से शून्य की यह यात्रा अनन्त है इसे अज़ल से अबद तक का सफर भी कहा जाता है। इसमें कंप्लीट सरेंडर करना पड़ता है या तो किसी दिव्य पुरष के आगे जिसे गुरु कहा जाता है। या उसे मुर्शिद कहा जाता है बात एक ही है। ये सब्र का सफर ऐसे ही नहीं शुरु हो जाता इसे शुरू करने और कराने में एक गुरु की आवश्यकता होती है और उसे खोजना होता है या वो खुद रांझा बनकर अपनी हीर को खोज लेता है पर बात यहाँ उसके इशारों पर नाचने जैसी है बाबा बुल्लेशाह की तरह या सन्त नामदेव की तरह जो कुत्ते को परमशक्ति का साक्षात्कार मान बैठता है। क्योंकि हमारी आँखें तो मूसा की आँखों जितनी भी काबिल नहीं हैं जब वो ही उस जल्वे को न देख सका तो हम उसे कैसे देख सकते हैं। हमें अपने चारों और ही किसी खोजी को खोजना होगा जो हमारी ही तरह का हमारी ही तरह रहने वाला हमारी ही तरह बोलने वाला हो जो हमें हमारी ही जबान में हमारी जरूरतों के हिसाब से हमें सिखा सके। मेरी राय में अपनी खोज जारी रखो उसकी जो तुम्हें वो अदा सिखा सके जो औरों को दीवानापन लगे और उस परमशक्ति को सम्पूर्ण शरणागति यानी कमप्लीट सरेंडर लगे फिर सब्र सन्तोष और आनन्द की अनुभूति या एहसास अपने आप होगा।
बहुत कुछ बताने को है, पर गुब्बारे में आज के लिए इतनी ही हवा भरी जाए नहीं तो वह फट भी सकता है। इसे अगर तीन बार पढ़ लिया जाए तो कोई बात ऐसी हो सकती है जो आपके काम की हो। हम हलवाई हैं जलेबी की तरह लिखते हैं जो रस चखना जानता है वो उसे पा लेगा।
आप और आपका परिवार खुश रहे इतना कुछ पढ़ने के लिए तहे-दिल से शुक्रिया
~पवन राज सिंह
बहुत कुछ बताने को है, पर गुब्बारे में आज के लिए इतनी ही हवा भरी जाए नहीं तो वह फट भी सकता है। इसे अगर तीन बार पढ़ लिया जाए तो कोई बात ऐसी हो सकती है जो आपके काम की हो। हम हलवाई हैं जलेबी की तरह लिखते हैं जो रस चखना जानता है वो उसे पा लेगा।
आप और आपका परिवार खुश रहे इतना कुछ पढ़ने के लिए तहे-दिल से शुक्रिया
~पवन राज सिंह
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