भारतीय सन्तों में एक सन्त ऐसे हैं जिनका नाम उच्च पद को प्राप्त है उनका नाम है संत नामदेव आइये जानते हैं। इनके बारे में
संत नामदेव जी (29 अक्टूबर, 1270 –1350) का जन्म (महाराष्ट्र) के गाँव "नरसी"-"वामनी" में हुआ । यह गाँव "ज़िला सितारा" में है और अब इसका नाम "नरसी नामदेव" है । उनके पिता जी का नाम दमशेटी और माता जी का नाम गोनाबाई था। उनके पिता जी छीपे थे, जो कपड़ों की सिलाई का काम करते थे। उन्होंने ईश्वर की भक्ति और गृहस्थ जीवन की श्रेष्ठता पर ज़ोर दिया। संत ज्ञानदेव और दूसरे संतों के साथ आप ने सारे देश का भ्रमण किया। वह पंजाब के गुरदासपुर ज़िला के गाँव घुमाण में बीस साल रहे। उन्होंने मराठी, हिंदी और पंजाबी में काव्य रचना की। उन की वाणी गुरू ग्रंथ साहिब में भी दर्ज है
एक बहुत ही अचंभित करने वाली कहानी इनके जीवन से जुडी है जब आप छोटे थे तो कहीं बैठकर रोटी खा रहे थे, उसी समय एक कुत्ता आया और रोटी छीनकर चला गया संत नामदेव उस समय बालक ही थे उन्होंने हाथ में घी की कटोरी हाथ में ली और कुत्ते के पीछे पीछे भागे और भागते भागते कुत्ते से कहने लगे प्रभु आप घी तो लगवा लें इस रोटी पर बिना घी की रोटी आपको अच्छी नहीं लगी तो, मैं अपने आपको कोसूँगा। इस प्रकार की शरणागति उस परमात्मा के प्रति रखते थे संत नामदेव
दोहे संत नामदेव जी के ;-
(अभिअंतर नहीं भाव, नाम कहै हरि नांव सूं,
नीर बिहूणी नांव, कैसे तिरिबौ केसवे) (1)
नीर बिहूणी नांव, कैसे तिरिबौ केसवे) (1)
(अभि अंतरि काला रहै, बाहरि करै उजास,
नांम कहै हरि भजन बिन, निहचै नरक निवास) (2)
नांम कहै हरि भजन बिन, निहचै नरक निवास) (2)
(अभि अंतरि राता रहै, बाहरि रहै उदास,
नांम कहै मैं पाइयौ, भाव भगति बिसवास) (3)
नांम कहै मैं पाइयौ, भाव भगति बिसवास) (3)
(बालापन तैं हरि भज्यौं, जग तैं रहे निरास,
नांमदेव चंदन भया सीतल सबद निवास) (4)
नांमदेव चंदन भया सीतल सबद निवास) (4)
(पै पायौ देवल फिरयौ, भगति न आई तोहि,
साधन की सेवा करीहौ नामदेव, जौ मिलियौ चाहे मोहि) (5)
साधन की सेवा करीहौ नामदेव, जौ मिलियौ चाहे मोहि) (5)
(जेता अंतर भगत सूं तेता हरि सूं होइ,
नाम कहै ता दास की मुक्ति कहां तैं होइ) (6)
नाम कहै ता दास की मुक्ति कहां तैं होइ) (6)
(ढिग ढिग ढूंढै अंध ज्यूं, चीन्है नाहीं संत,
नांम कहै क्यूं पाईये, बिन भगता भगवंत ) (7)
नांम कहै क्यूं पाईये, बिन भगता भगवंत ) (7)
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