हर परिवार की अपनी इक कहानी या जीवन के क्षण होते हैं, जिन्हें पारिवारिक जन ही महसूस कर सकते हैं,
बाबू जी के चले जाने के बाद माँ को फेमिली पेंशन मिलने लगी, माँ भी उम्र दराज हो चली हैं, पर उनको महीने में इक रोज बैंक जाने का बड़ा चाव रहता है। यूँ तो माँ महीने भर अपने नित्य काम-काज में ही व्यस्त रहती हैं मुझे भी कुछ नहीं कहती, सामान्य बातें जो माँ बेटों में रहती हैं वही होती हैं हम दोनों के बीच। किन्तु पेंशन वाले दिन से पहले ही वह उत्साहित हो कह उठती है "पासबुक छपाने चलेंगे"। उसे पेंशन से ज्यादा उस मशीन से मिलना अच्छा लगता है। जो बिना किसी आदमी के ख़ुद पासबुक छापती है।
आजकल बैंकों में पासबुक्स में एंट्री करने की मशीनें लगी हैं, जो पास बुक के बार कोड (barcode) को रीड करके ग्राहक और उसके अकाउंट को पहचानती हैं, फिर लास्ट प्रिंटेड पेज को देखकर ओटीमेटिक्ली पासबुक की आगे की एंट्रियों को छाप देती है। ऐसी मशीनें और उनकी कार्यप्रणाली देखकर माँ अचंभित और उत्साह से कह उठती है, "क्या नया जमाना आ गया आदमी की कोई आवश्यकता ही नहीं किसी कार्य को मशीनें स्वतः ही सम्पन्न कर देती हैं।"
मैं माँ को अपने साथ बैंक ले जाता हूँ जहाँ स्लिप भरने से पेंशन लेने तक उसकी आँखें हर होने वाली घटना को देखती और सीखती रहती है। उन आँखों में एक नवीन शिष्य जैसी उम्मीदें होती है कि अगली बार जब मैं यहां आऊँ तो यह कार्य जो मैंने सीख लिया है कैसे होता है, तो उसे स्वतः कर पाऊं। किन्तु हर बार वह उसी नवीनता में चली जाती है, पुराने सारे अनुभवों को भुला देती है। कुछ ख़ास बातें ही उसे याद रहती हैं। जैसे उस क्लर्क से नमस्ते करना जब पेंशन मिल जाती है और उस मैनेजर से भी जब वह पेंशन स्लिप को अप्रूव कर देता है। माँ इतना समझती है की किसी का शुक्रिया करने से वह भविष्य में याद रखता है सम्मान के बदले में अगली बार अधिक सम्मान या पहचान प्राप्त होती है। पैसा या धन की वास्तविक जीवन में इतनी महत्ता नहीं है जितना की जान पहचान की है। यह सदियों से चली आ रही भारतीय ग्रामीण परम्परा या पुरातन परम्परा की पहचान है जिसे माँ बताती रहती है।
बाबू जी के चले जाने के बाद माँ को फेमिली पेंशन मिलने लगी, माँ भी उम्र दराज हो चली हैं, पर उनको महीने में इक रोज बैंक जाने का बड़ा चाव रहता है। यूँ तो माँ महीने भर अपने नित्य काम-काज में ही व्यस्त रहती हैं मुझे भी कुछ नहीं कहती, सामान्य बातें जो माँ बेटों में रहती हैं वही होती हैं हम दोनों के बीच। किन्तु पेंशन वाले दिन से पहले ही वह उत्साहित हो कह उठती है "पासबुक छपाने चलेंगे"। उसे पेंशन से ज्यादा उस मशीन से मिलना अच्छा लगता है। जो बिना किसी आदमी के ख़ुद पासबुक छापती है।
आजकल बैंकों में पासबुक्स में एंट्री करने की मशीनें लगी हैं, जो पास बुक के बार कोड (barcode) को रीड करके ग्राहक और उसके अकाउंट को पहचानती हैं, फिर लास्ट प्रिंटेड पेज को देखकर ओटीमेटिक्ली पासबुक की आगे की एंट्रियों को छाप देती है। ऐसी मशीनें और उनकी कार्यप्रणाली देखकर माँ अचंभित और उत्साह से कह उठती है, "क्या नया जमाना आ गया आदमी की कोई आवश्यकता ही नहीं किसी कार्य को मशीनें स्वतः ही सम्पन्न कर देती हैं।"
मैं माँ को अपने साथ बैंक ले जाता हूँ जहाँ स्लिप भरने से पेंशन लेने तक उसकी आँखें हर होने वाली घटना को देखती और सीखती रहती है। उन आँखों में एक नवीन शिष्य जैसी उम्मीदें होती है कि अगली बार जब मैं यहां आऊँ तो यह कार्य जो मैंने सीख लिया है कैसे होता है, तो उसे स्वतः कर पाऊं। किन्तु हर बार वह उसी नवीनता में चली जाती है, पुराने सारे अनुभवों को भुला देती है। कुछ ख़ास बातें ही उसे याद रहती हैं। जैसे उस क्लर्क से नमस्ते करना जब पेंशन मिल जाती है और उस मैनेजर से भी जब वह पेंशन स्लिप को अप्रूव कर देता है। माँ इतना समझती है की किसी का शुक्रिया करने से वह भविष्य में याद रखता है सम्मान के बदले में अगली बार अधिक सम्मान या पहचान प्राप्त होती है। पैसा या धन की वास्तविक जीवन में इतनी महत्ता नहीं है जितना की जान पहचान की है। यह सदियों से चली आ रही भारतीय ग्रामीण परम्परा या पुरातन परम्परा की पहचान है जिसे माँ बताती रहती है।
पुरानी पीढ़ी और नई तकनीकों में जो आपसी मिलन है उसे पाठकों तक पहुँचाकर मुझे भी एक नया अनुभव एक उस पुल के जैसे महसूस होता है जिस पर चलकर इधर के लोग उधर उधर के लोग इधर आकर देखते हैं की नवीनता क्या है और पुरातन पथ कैसा है।
आप सभी का शुक्रिया
~पवन राज सिंह
~पवन राज सिंह
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