लेखन फिर से प्रारम्भ है....
सर्प जिस तरह छोटी सी जगह में अपने आपको समेट लेता है उसी प्रकार मन के किसी कोने में पाप की शक्ति अपने दांतों में विषाक्त रस को लिए बैठी रहती है, मनुष्य जीवन भर इस रस के केंद्र के इर्द गिर्द चक्कर लगाता है, अपने कर्मों को इसी की प्राप्ति में लगाता है और फिर एक दिन इसका शिकार हो जाता है। समझना होगा इस गूढ़ रहस्य को, हमें उस रस के स्वाद में नहीं आना है हमें कोई रिक्तता खोजनी होगी मन के अंदर जहाँ यह विषाक्त रस न पहुँचे, वहीं पर इसके विषदन्तों का प्राण होगा और वहीं हमारी आत्म शक्ति भी होगी, चयन हमारे हाथों में है? किसी तिलिस्म में घिरना है या आत्म ज्ञान से जीवन रूपी पहेली को हल करना है..~पवन राज सिंह
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